गहलोत-पायलट के रिश्ते में आई नर्मी, क्या सुलह हो गई?

राजस्थान, वायरल सच (ब्यूरो) : राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। स्वर्गीय राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता सचिन पायलट के बीच रिश्तों की ‘पुरानी तल्ख़ियों’ पर कथित रूप से मरहम लगता दिखा। गहलोत ने मीडिया के सामने कहा, “मैं और पायलट कब अलग थे? हम तो हमेशा साथ हैं।” इस बयान ने राज्य की राजनीति में नए संकेत छोड़ दिए हैं।

क्या सच में मिट गईं दूरियां?

सालों तक कांग्रेस में टकराव का चेहरा बने गहलोत और पायलट के संबंध अब अचानक से मधुर कैसे हो गए? यही सवाल दौसा में कार्यक्रम के बाद हर किसी की जुबान पर था।
जिस मंच से कभी गहलोत ने पायलट को “पार्टी विरोधी” तक कह दिया था, उसी मंच से उन्होंने अब पायलट के लिए प्रेम, सौहार्द और एकता की बातें कीं।

गहलोत ने कहा:

“ये मीडिया ही है जो हमारी अनबन की खबरें चलाता रहता है। हम दोनों में मोहब्बत भी है और समझ भी।”

इतिहास रहा है तनाव भरा

2018 में कांग्रेस सरकार के गठन के समय से ही गहलोत और पायलट के बीच तनाव सार्वजनिक था।
2020 में जब सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ मानेसर चले गए थे, तब गहलोत ने उन्हें “निकम्मा” तक कह दिया था।

इस बयानबाजी से कांग्रेस की अंदरूनी खाई गहरी हुई थी।

मगर अब गहलोत के बदले रुख को लेकर सवाल उठ रहे हैं—क्या यह सच्चा मेल है, या चुनावी मजबूरी?


कांग्रेस आलाकमान का दबाव या सियासी दांव?

राजनीतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई है:

  • कुछ इसे कांग्रेस हाईकमान के दबाव का नतीजा मानते हैं, ताकि राजस्थान में पार्टी को फिर एकजुट किया जा सके।
  • वहीं अन्य इसे चुनाव से पहले किया गया पॉलिटिकल स्टंट बता रहे हैं, ताकि सचिन पायलट समर्थक मतदाताओं को साधा जा सके।

पायलट खेमा भले चुप, मगर उत्साहित

हालांकि सचिन पायलट ने इस बयान पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया है, लेकिन उनके करीबी नेताओं में खुशी और सुकून की झलक साफ देखी जा रही है।
गहलोत के इस ‘प्रेमभरे’ बयान को पायलट खेमा “सम्मान की पुनर्प्राप्ति” के तौर पर देख रहा है।

क्या साथ लड़ेंगे अगला चुनाव?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह मेल कांग्रेस को फायदा देगा?
क्या पायलट और गहलोत एक मंच पर साथ आकर अगला चुनाव लड़ेंगे या ये सिर्फ चुनावी मंच का तात्कालिक मेल है?

यदि दोनों नेता वास्तव में एकजुट हो गए, तो यह कांग्रेस के लिए राजस्थान में एक मजबूत वापसी का संकेत हो सकता है।
लेकिन अगर यह सिर्फ दिखावटी मेल है, तो अंदरूनी कलह फिर सिर उठा सकती है।

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