जगन्नाथ रथ यात्रा 2025: रथ निर्माण और यात्रा के बाद क्या होता है

ओडिशा, वायरल सच (ब्यूरो) : आज से जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 की भव्य शुरुआत हो गई है। इस पवित्र अवसर पर पुरी नगरी भक्तिभाव में डूबी हुई है। भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियां रथों में विराजमान कर भक्तों द्वारा खींची जा रही हैं।तड़के सुबह मंगला आरती के बाद भगवान जगन्नाथ, उनके भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा का श्रृंगार किया गया और खिचड़ी का भोग अर्पित कर उन्हें रथ यात्रा के लिए तैयार किया गया।

सुबह 9:30 बजे से देवताओं को रथों में विराजमान करने की परंपरा शुरू हुई, जिसे स्थानीय भाषा में ‘पहंडी’ कहा जाता है। दोपहर में पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंह देव ने सोने की झाड़ू से रथ मार्ग की सफाई कर यात्रा का शुभारंभ किया। यह परंपरा ‘छेड़ा पूजा’ के नाम से प्रसिद्ध है।

रथ यात्रा: सिर्फ एक उत्सव नहीं, एक जीवंत परंपरा


पुरी की रथ यात्रा जितनी भव्य है, उतनी ही रोचक है इसके पीछे की तैयारी। बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ के रथों का निर्माण हर साल नई लकड़ियों से होता है – और यह निर्माण अपने आप में एक धार्मिक अनुष्ठान है।

रथ बनाने की शुरुआत: अक्षय तृतीया से पहले


रथों की तैयारी महीनों पहले अक्षय तृतीया के दिन से शुरू हो जाती है। इस दिन को शुभ माना जाता है और तभी से कारीगर, जिन्हें ‘महारण’ कहा जाता है, रथों की लकड़ी पर काम शुरू कर देते हैं। लकड़ियां ओडिशा के मयूरभंज, गंजाम और क्योंझर जिलों के घने और पवित्र जंगलों से लाई जाती हैं।

पेड़ों को काटने से पहले विधिवत पूजा होती है। केवल उन्हीं पेड़ों को चुना जाता है जिनमें चक्र, शंख, गदा जैसे प्रतीक होते हैं — यानी जो पेड़ खुद किसी ईश्वरीय संकेत को दर्शाते हों। इसके अलावा, ऐसे पेड़ों को नहीं काटा जाता जिनके पास पक्षियों के घोंसले हों, सांप के बिल हों या जो किसी नदी या मंदिर के पास हों।

रथ निर्माण: लकड़ी का विज्ञान और श्रद्धा का मेल


रथ निर्माण में हर लकड़ी की अपनी भूमिका होती है:

  • धौरा लकड़ी से मजबूत पहिए बनाए जाते हैं।
  • फासी लकड़ी से पहिए की धुरी (एक्सल) तैयार होती है।
  • सिमली लकड़ी का इस्तेमाल ऊपर की छत और ढांचे के लिए किया जाता है क्योंकि यह हल्की होती है।
  • सहजा लकड़ी सजावटी हिस्सों और हल्के कामों में उपयोग होती है।

प्रत्येक रथ विशाल होता है

  • भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ में 16 पहिए होते हैं।
  • बलभद्र के तालध्वज रथ में 14 पहिए।
  • और सुभद्रा के दर्पदलन रथ में 12 पहिए होते हैं।

इन रथों की ऊंचाई, रंग और ध्वज तक अलग होते हैं। हर चीज़ का एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ होता है।

तो फिर यात्रा के बाद रथों का क्या होता है?


यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि इतने भव्य रथों का क्या होता है जब यात्रा समाप्त हो जाती है?

उत्तर सरल है – रथों की लकड़ी को फेंका नहीं जाता।
रथ यात्रा के बाद, इन रथों को सावधानी से हटाकर उनकी लकड़ी का उपयोग धार्मिक कार्यों में किया जाता है। मंदिर की विशाल रसोई में प्रसाद पकाने के लिए इस लकड़ी को ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। इससे न सिर्फ पर्यावरण की रक्षा होती है, बल्कि रथ की पवित्रता भी बनी रहती है।

कुछ लकड़ियां विशेष भंडारण में भी जाती हैं और भविष्य में पुनः उपयोग या धार्मिक कार्यों में आती हैं। इसे ही सनातन संस्कृति कहते हैं – जहां कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता।

अंत में…
पुरी की रथ यात्रा सिर्फ एक तीर्थ या त्योहार नहीं, बल्कि भारत की जीवंत परंपराओं और गहरी आस्था का दर्पण है। हर साल जब रथ खींचे जाते हैं, न केवल देवता यात्रा पर निकलते हैं, बल्कि लोगों की श्रद्धा, सामूहिकता और संस्कृति भी एक पवित्र यात्रा पर निकल पड़ती है।

यह केवल लकड़ी के रथ नहीं हैं, यह आस्था के पहिए हैं, जो पीढ़ियों से घूमते चले आ रहे हैं – बिना रुके, बिना थके।

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