गुरुग्राम, वायरल सच (ब्यूरो): गुरुग्राम में करोड़ों रुपये की लागत से लगाए गए स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम की क्षमता पर पीक आवर्स के दौरान सवाल उठ रहे हैं। IFFCO चौक, राजीव चौक, सुभाष चौक और वाटिका चौक जैसे व्यस्त जंक्शनों पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ने पर पुलिसकर्मियों को कई बार ऑटोमैटिक सिग्नल व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेकर मैनुअली ट्रैफिक चलाना पड़ रहा है।
111 चौराहों पर 12.5 करोड़ रुपये की परियोजना
Gurugram Smart Traffic Signals परियोजना के पहले चरण में GMDA ने सेक्टर 1 से 55 तक 111 चौराहों को अपग्रेड करने का काम किया है। इस चरण की लागत करीब 12.5 करोड़ रुपये है।
दूसरे चरण के लिए सेक्टर 58 से 115 के बीच 32 स्थानों की पहचान की गई है, जिसकी अनुमानित लागत 7.46 करोड़ रुपये बताई गई है। Adaptive Traffic Control System (ATCS) के तहत GMDA ने 141 स्मार्ट सेंसर कैमरे लगाए हैं।
ट्रैफिक के हिसाब से खुद बदलता है सिग्नल टाइम
Gurugram Smart Traffic Signals में लगे वाहन डिटेक्टर कैमरे प्रत्येक दिशा से आने वाले ट्रैफिक की मात्रा का आकलन करते हैं। इसके आधार पर सिस्टम ग्रीन सिग्नल की अवधि को अपने आप बदलता है।
यह नेटवर्क GMDA के Integrated Command and Control Centre (ICCC) से जुड़ा है, जहां वाहनों की आवाजाही पर निगरानी रखी जाती है।
GMDA अधिकारियों के अनुसार फिलहाल 111 चौराहे और 141 कैमरे पूरी तरह काम कर रहे हैं। टेंडर के तहत इंस्टॉलेशन पूरा होने के बाद ठेकेदार को कैमरों का सात साल तक रखरखाव करना है और इसका खर्च टेंडर राशि में शामिल है।
अचानक बढ़े ट्रैफिक में सिस्टम की चुनौती
ट्रैफिक कर्मियों के मुताबिक सामान्य और लगातार चलने वाले ट्रैफिक में सिस्टम बेहतर तरीके से काम करता है, लेकिन सुबह और शाम के पीक आवर्स में स्थिति अलग हो जाती है।
अचानक लेन बदलने वाले वाहन, दोपहिया वाहनों का छोटी जगहों से निकलना और एक जंक्शन से दूसरे जंक्शन तक ट्रैफिक का दबाव बढ़ना ऑटोमैटिक सिस्टम के लिए चुनौती बन जाता है। ऐसे हालात में पुलिस को मैनुअल मोड में ट्रैफिक नियंत्रित करना पड़ता है।
एक ट्रैफिक अधिकारी के मुताबिक वाटिका चौक पर दोपहर के अपेक्षाकृत सामान्य ट्रैफिक में सिस्टम काम करता है, लेकिन सुबह और शाम के दबाव में लंबी कतारों से बचने के लिए पुलिसकर्मियों को मैनुअली ट्रैफिक चलाना पड़ता है।
जलभराव और रूट डायवर्जन में भी करना पड़ता है हस्तक्षेप
ACP ट्रैफिक (मुख्यालय एवं हाईवे) सत्यपाल यादव ने बताया कि सड़क पर मौजूद ट्रैफिक अधिकारी वाहन संख्या और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों के आधार पर ऑटोमैटिक सिग्नल को ओवरराइड करते हैं।
उन्होंने कहा कि जलभराव, रूट डायवर्जन और अन्य अप्रत्याशित परिस्थितियों में ट्रैफिक को जमीन पर मौजूद स्थिति के अनुसार नियंत्रित करने के लिए ऑटोमैटिक टाइमर बंद करना पड़ता है। इसके लिए कोई विशेष प्रोटोकॉल तय नहीं है।
GMDA के अनुसार लंबे समय का ब्रेकडाउन दर्ज नहीं
GMDA अधिकारियों का कहना है कि सिस्टम में लंबे समय तक चलने वाले ब्रेकडाउन के मामले रिकॉर्ड नहीं हुए हैं। लंबे पावर कट के दौरान कभी-कभार व्यवधान आ सकता है और कैमरों में दो बैटरियां उपलब्ध हैं।
सिस्टम की जांच के लिए तीन टीमें साप्ताहिक निरीक्षण करती हैं। हालांकि GMDA अलग से मेंटेनेंस कॉल या छोटे ब्रेकडाउन का रिकॉर्ड नहीं रखता। इसलिए कुल खराबियों, शिकायतों और औसत रिपेयर टाइम का अलग आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
GMDA के स्मार्ट सिटी सिग्नल प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारी मनोज सैनी के मुताबिक कैमरे करीब 20 से 30 मीटर के दायरे में वाहनों की आवाजाही पहचानकर सिग्नल को उसके अनुसार एडजस्ट करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अधिक धूल कैमरों की विजिबिलिटी प्रभावित कर सकती है और सिस्टम में तकनीकी समस्या आने पर वाहन डिटेक्शन रुक सकता है।
चार घंटे में मरम्मत का दावा
मनोज सैनी के अनुसार GMDA की तीन ऑन-ग्राउंड टीमें सिस्टम में आने वाली खराबियों को दूर करने के लिए तैनात हैं और कैमरों को चार घंटे के भीतर ठीक करने का लक्ष्य रखा गया है।
उन्होंने कहा कि GMDA और ट्रैफिक पुलिस का उद्देश्य सड़कों पर मैनुअल हस्तक्षेप को शून्य करना है और इसके लिए दोनों विभाग मिलकर रणनीति तैयार कर रहे हैं।
