डॉक्टर अफरीदी को रिहा करो US सांसद ने पाक सरकार पर दबाव बनाया

नई दिल्ली, वायरल सच (ब्यूरो) : अमेरिकी सांसद ब्रैड शरमन ने पाकिस्तान की सरकार से डॉ. शकील अफरीदी को जेल से रिहा करने का कड़ा आग्रह किया है। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान से खतरनाक आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग की है। यह बयान पाकिस्तान के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान आया, जिसकी अगुवाई पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी कर रहे थे।

अमेरिकी सांसद का आग्रह: अफरीदी को रिहा करो
ब्रैड शरमन ने इस प्रतिनिधिमंडल से कहा कि डॉ. शकील अफरीदी की रिहाई 9/11 के आतंकवादी हमलों के पीड़ितों के लिए न्याय का एक महत्वपूर्ण कदम होगा। अफरीदी का नाम इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को ओसामा बिन लादेन के ठिकाने तक पहुँचने में मदद की थी।

डॉ. शकील अफरीदी कौन हैं?
डॉ. शकील अफरीदी एक पाकिस्तानी चिकित्सक हैं जिन्होंने खैबर पख्तूनख्वा में पोलियो वैक्सीन के बहाने बिन लादेन के परिवार के डीएनए सैंपल इकट्ठा किए थे, जिससे अमेरिका को 2011 में अब्बोटाबाद में बिन लादेन के ठिकाने पर हमला करने में मदद मिली। हालांकि, इसी कारण पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर 33 साल की सजा सुनाई, जिसे बाद में घटाकर 26 साल कर दिया गया। अमेरिकी सरकार अफरीदी को एक हीरो मानती है और उनकी रिहाई के लिए लगातार दबाव बना रही है।

जैश-ए-मोहम्मद का खात्मा करने पर जोर
सांसद ब्रैड शरमन ने प्रतिनिधिमंडल से कहा कि पाकिस्तान को आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को खत्म करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। उन्होंने 2002 में मारे गए पत्रकार डैनियल पर्ल की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि जैश-ए-मोहम्मद ने इस “घिनौने” कृत्य को अंजाम दिया था। डैनियल पर्ल, वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार थे, जिन्हें पाकिस्तानी आतंकवादी उमर सईद शेख ने अगवा कर हत्या कर दी थी। सांसद ने कहा कि डैनियल पर्ल का परिवार अब भी उनके क्षेत्र में रहता है, इसलिए पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कठोर कदम उठाने चाहिए।

धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी आवश्यक
ब्रैड शरमन ने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वह देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों—जैसे ईसाई, हिंदू और अहमदिया मुसलमानों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। सांसद ने कहा कि इन्हें अपनी आस्था पर खुले मन से अमल करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बिना किसी डर या भेदभाव के हिस्सा लेने का अधिकार मिलना चाहिए।

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