गुरुग्राम, वायरल सच (ब्यूरो): अडानी रियल्टी में सेल्स मैनेजर रहे 31 वर्षीय Yuvraj मनचंदा की हत्या का मामला अब गुरुग्राम पुलिस की कार्यप्रणाली और अज्ञात शवों की पहचान से जुड़ी प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। दिल्ली के रहने वाले युवराज 6 सितंबर 2026 को गुरुग्राम आए थे। पुलिस के अनुसार, उनकी पूर्व सहकर्मी अन्या वत्स और उसके साथी संयम सचदेवा पर हत्या करने का आरोप है। Yuvraj का शव 10 सितंबर को गुरुग्राम के सेक्टर-70 क्षेत्र में एक जलभराव वाली जगह से बरामद हुआ, लेकिन उनकी पहचान सुनिश्चित किए बिना 14 सितंबर को अज्ञात व्यक्ति मानकर अंतिम संस्कार कर दिया गया।
परिवार का आरोप है कि पुलिस रिकॉर्ड और अंतरराज्यीय सूचना नेटवर्क पर समय से जानकारी साझा की जाती, तो युवराज की पहचान अंतिम संस्कार से पहले हो सकती थी। इस मामले में जांच अधिकारी ASI साहून खान को पहले निलंबित किया गया और बाद में बादशाहपुर थाने के SHO राजेश बागड़ी पर भी कार्रवाई हुई। मामला दिल्ली की अदालत से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। पुलिस कमिश्नर ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में प्रक्रियागत चूकें स्वीकार करते हुए माफी मांगी, जबकि दुर्भावनापूर्ण मंशा से इनकार किया।
9 अक्टूबर तक इस मामले का असर पुलिस व्यवस्था में भी दिखाई देने लगा है। हरियाणा पुलिस ने अज्ञात शवों की बरामदगी, पहचान, फॉरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित रखने और दूसरी जगहों की पुलिस को सूचना देने के लिए नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की है।
2 सितंबर: फ्लैट की बातचीत से शुरू हुई मुलाकात
पुलिस की जांच से जुड़े मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2 सितंबर को Yuvraj गुरुग्राम के सेक्टर-29 स्थित Roots Cafe में अपनी पूर्व सहकर्मी अन्या वत्स से मिले थे। अन्या पहले रियल एस्टेट कंपनी Emaar में काम कर चुकी थी और बाद में स्वतंत्र रियल एस्टेट एजेंट के तौर पर काम कर रही थी।
रिपोर्टों के मुताबिक, युवराज अक्टूबर में शादी करने वाले थे और घर खरीदने की योजना बना रहे थे। अन्या ने उन्हें गुरुग्राम के सेक्टर-70 स्थित Pyramid Society में कम कीमत पर फ्लैट मिलने की जानकारी दी थी। इसी सिलसिले में दोनों की मुलाकात हुई।
पुलिस के अनुसार, इस मुलाकात के दौरान अन्या ने युवराज की आर्थिक स्थिति के बारे में भी जानकारी जुटाई। जांचकर्ताओं को संदेह है कि युवराज के बैंक बैलेंस, संभावित लोन और परिवार या दोस्तों से जुटाई जा सकने वाली रकम के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की गई। पुलिस का आरोप है कि इसी दौरान अन्या को युवराज के फोन का पासवर्ड देखने का अवसर मिला, जिसका इस्तेमाल बाद में उनके परिवार को संदेश भेजने के लिए किया गया।
हालांकि, 2 सितंबर की मुलाकात से जुड़े घटनाक्रम और कथित साजिश की पूरी पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
कथित आर्थिक विवाद: 90 लाख रुपये का चेक और फर्जी नोटिस
Yuvraj मर्डर केस की जांच में एक कथित आर्थिक विवाद भी सामने आया है। दिल्ली पुलिस से जुड़े सूत्रों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, अन्या वत्स और संयम सचदेवा पर एक वरिष्ठ पंजाब नेशनल बैंक (PNB) अधिकारी से कथित तौर पर 1.25 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी करने का आरोप है। इस संबंध में संसद मार्ग थाने में अगस्त 2026 में मामला दर्ज होने की रिपोर्ट है।
जांच के अनुसार, आरोपियों ने कथित तौर पर सरकारी अधिकारियों से संबंध होने का दावा किया और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के नाम से फर्जी नोटिस दिखाए। आरोप है कि इन नोटिसों के आधार पर शिकायतकर्ता से पैसे लिए गए। बाद में नोटिसों के फर्जी होने का पता चलने पर शिकायतकर्ता ने रकम वापस मांगी।
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि शिकायतकर्ता ने समझौते के लिए 90 लाख रुपये का पोस्ट-डेटेड चेक मांगा था। पुलिस की जांच के अनुसार, अन्या के पास इतनी रकम उपलब्ध नहीं थी और वह भुगतान की व्यवस्था करने की कोशिश कर रही थी।
पुलिस का आरोप है कि इसी आर्थिक दबाव के बीच युवराज को निशाना बनाने की योजना बनी। जांचकर्ता यह भी पड़ताल कर रहे हैं कि युवराज को आरोपियों के कथित आर्थिक लेन-देन या धोखाधड़ी के बारे में कोई जानकारी थी या नहीं। इन सभी पहलुओं को फिलहाल पुलिस की जांच से जुड़े आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
6 सितंबर: गुरुग्राम बुलाने के बाद हत्या का आरोप
पुलिस के अनुसार, 6 सितंबर को युवराज अपनी बहन के साथ दिल्ली के लाजपत नगर स्थित Golden Dragon रेस्टोरेंट में थे। इसी दौरान अन्या का फोन आया। जांचकर्ताओं के मुताबिक, अन्या ने उन्हें बताया कि एक संभावित ग्राहक अडानी रियल्टी में निवेश करना चाहता है और सौदा तुरंत तय करने के लिए उनकी मौजूदगी जरूरी है।
Yuvraj अपनी MG Astor कार से गुरुग्राम पहुंचे और कथित तौर पर अन्या की सफेद Creta में बैठ गए। पुलिस का आरोप है कि कार के अंदर अन्या और उसके साथी संयम सचदेवा ने उन्हें गोली मार दी। इसके बाद शव को चादरों से ढककर वाहन में रखा गया।
जांचकर्ताओं के अनुसार, आरोपियों ने शव को करीब दो दिन तक वाहन में रखने के बाद गुरुग्राम के बादशाहपुर क्षेत्र में एक नाले या जलभराव वाली जगह पर फेंक दिया। पुलिस ने इस घटनाक्रम और शव को ठिकाने लगाने से जुड़े विवरणों की जांच की है।
हत्या के कथित मकसद और घटनाक्रम का अंतिम निर्धारण अदालत में पेश साक्ष्यों, फॉरेंसिक रिपोर्ट और जांच के निष्कर्षों के आधार पर होगा। 
6 से 8 सितंबर: युवराज के फोन से परिवार को भेजे गए संदेश
Yuvraj के परिवार को शुरुआत में उनकी मौत का पता नहीं चला। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 6 सितंबर के बाद भी उनके फोन से परिवार और परिचितों को संदेश भेजे गए। संदेशों में युवराज के ठीक होने, काम में व्यस्त होने और जल्द लौटने जैसी बातें कही गईं।
पुलिस का आरोप है कि अन्या ने 2 सितंबर को Yuvraj के फोन का पासवर्ड देख लिया था और बाद में उसी फोन से संदेश भेजे। रिपोर्टों में बताया गया कि परिवार को बेंगलुरु जाने से संबंधित संदेश और टिकट की तस्वीर भी भेजी गई। इससे परिजनों को कुछ समय तक लगा कि युवराज काम के सिलसिले में बाहर हैं।
8 सितंबर के आसपास उनका फोन बंद हो गया। परिवार की चिंता बढ़ी और उनकी तलाश शुरू हुई। जांचकर्ताओं का मानना है कि फोन से संदेश भेजने का उद्देश्य परिवार को गुमराह करना और गुमशुदगी की शिकायत दर्ज होने में देरी कराना हो सकता था।
यह पुलिस की जांच में सामने आया आरोप है; डिजिटल रिकॉर्ड और संदेशों की फॉरेंसिक जांच इस घटनाक्रम को स्थापित करने में महत्वपूर्ण है।
10 सितंबर: सेक्टर-70 में मिला अज्ञात शव
10 सितंबर को गुरुग्राम पुलिस कंट्रोल रूम को शाम करीब 4:05 बजे सेक्टर-70 में नाले के पास जलभराव वाली जगह पर शव मिलने की सूचना मिली। पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के अनुसार, शव काफी फूल चुका था और सड़ने की स्थिति में था, जिसके कारण फिंगरप्रिंट लेना मुश्किल था तथा मौके पर बाहरी चोटों की विस्तृत जांच नहीं हो सकी।
शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। इसके बाद पुलिस ने उसकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए, लेकिन बाद में यही प्रक्रिया विवाद का केंद्र बन गई।
इस समय दिल्ली में Yuvraj के परिवार को उनकी तलाश थी। दोनों शहरों में चल रही प्रक्रियाओं के बीच अज्ञात शव की जानकारी को सही समय पर साझा करना बेहद जरूरी था, ताकि गुमशुदगी के रिकॉर्ड और बरामद शव का मिलान हो सके।
11 सितंबर: दिल्ली में दर्ज हुई गुमशुदगी की शिकायत
Yuvraj के परिवार ने 11 सितंबर को दिल्ली के लाजपत नगर थाने में उनकी गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई। परिवार को उस समय यह जानकारी नहीं थी कि गुरुग्राम में एक शव बरामद हो चुका है।
दिल्ली पुलिस ने Yuvraj की गतिविधियों, तकनीकी रिकॉर्ड और CCTV फुटेज की जांच शुरू की। जांच के दौरान पुलिस का संदेह उनकी पूर्व सहकर्मी अन्या वत्स और उसके साथी संयम सचदेवा की ओर गया।
पुलिस ने उनके फोन, वाहन और अन्य सुरागों की पड़ताल की। जांचकर्ताओं के मुताबिक, आरोपियों की गतिविधियों का पता लगाने के लिए दिल्ली से बाहर भी कार्रवाई की गई।
14 सितंबर: अज्ञात मानकर शव का अंतिम संस्कार
यह तारीख पूरे मामले का सबसे विवादित हिस्सा बन गई। पुलिस के अनुसार, 14 सितंबर को पोस्टमार्टम के बाद शव का राम बाग श्मशान घाट पर अज्ञात व्यक्ति के रूप में अंतिम संस्कार करा दिया गया।
परिवार का कहना है कि युवराज की पहचान की संभावना समाप्त होने से पहले पर्याप्त कदम उठाए जाने चाहिए थे। आरोप है कि शव की तस्वीरें और विवरण समय पर संबंधित पुलिस नेटवर्क पर उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे दिल्ली में दर्ज गुमशुदगी की शिकायत से मिलान नहीं हो सका।
बाद में सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक, शव की बरामदगी और अंतिम संस्कार के बीच CCTNS और ZIPNET पर जानकारी दर्ज करने की प्रक्रिया में देरी हुई। इसी कारण यह सवाल उठा कि क्या शव का अंतिम संस्कार करने से पहले सभी निर्धारित पहचान संबंधी प्रक्रियाएं पूरी की गई थीं।
15 और 16 सितंबर: रिकॉर्ड दर्ज होने और पहचान का घटनाक्रम
मीडिया रिपोर्टों और पुलिस के हलफनामे के अनुसार, शव की बरामदगी से जुड़ी CCTNS की IIF-10 प्रविष्टि 15 सितंबर को की गई, यानी अंतिम संस्कार के अगले दिन। ZIPNET पर शव की जानकारी और तस्वीरें 16 सितंबर तक अपलोड नहीं हुई थीं।
ZIPNET का पूरा नाम Zonal Integrated Police Network है। यह पुलिस के बीच गुमशुदा व्यक्तियों और अज्ञात शवों की जानकारी साझा करने में मदद करता है। CCTNS यानी Crime and Criminal Tracking Network & Systems पुलिस रिकॉर्ड का डिजिटल नेटवर्क है।
इसी दौरान दिल्ली पुलिस आरोपियों की तलाश में जुटी थी। प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने 15-16 सितंबर के दौरान उत्तराखंड में आरोपियों की गतिविधियों का पता लगाया और 17 सितंबर को उन्हें गिरफ्तार किया। दिल्ली पुलिस को गुरुग्राम में पहले शव बरामद होने और अंतिम संस्कार किए जाने की जानकारी बाद में मिली।
इन तारीखों और रिकॉर्ड को लेकर गुरुग्राम और दिल्ली पुलिस के हलफनामों में घटनाक्रम का अंतर भी सामने आया। इसने अंतरराज्यीय पुलिस समन्वय और रिकॉर्ड साझा करने की व्यवस्था पर सवाल बढ़ाए।
17 सितंबर: जांच अधिकारी ASI साहून खान निलंबित
प्रारंभिक जांच के बाद गुरुग्राम पुलिस ने बादशाहपुर थाने के जांच अधिकारी ASI साहून खान को निलंबित कर दिया। विभागीय कार्रवाई के आदेश में आरोप लगाया गया कि उन्होंने शव की पहचान स्थापित करने के लिए पर्याप्त प्रभावी प्रयास नहीं किए।
पुलिस के आंतरिक आकलन में स्थानीय अखबारों में पहचान संबंधी विज्ञापन प्रकाशित न करने, ZIPNET पर विवरण अपलोड न करने और CCTNS के निर्धारित फॉर्म में पूरी जानकारी दर्ज न करने जैसी चूकें सामने आईं।
आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि दिल्ली के लाजपत नगर थाने में अपहरण या गुमशुदगी से संबंधित मामला दर्ज था। यदि अज्ञात शव की जानकारी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ZIPNET पर उपलब्ध कराई जाती, तो उसकी पहचान स्थापित होने की संभावना थी।
19 से 22 सितंबर: परिवार ने उठाए सवाल, अदालत ने रिकॉर्ड सुरक्षित रखने को कहा
Yuvraj की पहचान और अंतिम संस्कार से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद परिवार ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। परिवार की ओर से शव की बरामदगी, पहचान, पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार से जुड़े दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की मांग की गई।
साकेत अदालत ने गुरुग्राम पुलिस को संबंधित पुलिस, मेडिकल, फॉरेंसिक, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने तथा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इसमें शव की बरामदगी और पहचान के रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम दस्तावेज, DNA और जैविक नमूने, तस्वीरें, वीडियो, ZIPNET प्रविष्टियां, पुलिस के बीच संचार और अंतिम संस्कार से जुड़े दस्तावेज शामिल थे।
इस चरण में परिवार का मुख्य सवाल यह था कि जब दिल्ली में गुमशुदगी की शिकायत मौजूद थी, तब गुरुग्राम में मिले अज्ञात शव का समय पर मिलान क्यों नहीं हो पाया।
23 से 25 सितंबर: दिल्ली की अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट पर सवाल उठाए
सितंबर के अंतिम सप्ताह में दिल्ली की अदालत में गुरुग्राम पुलिस की ओर से दिए गए जवाब और जांच संबंधी रिकॉर्ड पर सुनवाई हुई। 23 सितंबर को अदालत ने पुलिस के जवाब को अपर्याप्त बताते हुए प्रत्येक मुद्दे पर स्पष्ट विवरण मांगा।
25 सितंबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने शव का अंतिम संस्कार कर दिए जाने और जांच की प्रक्रिया पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत के समक्ष यह सवाल भी उठा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित गोली के घाव का उल्लेख क्यों नहीं था, जबकि दिल्ली पुलिस की जांच में गोली मारने का आरोप सामने आया था।
पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी नहीं होने, शव की पहचान के प्रयासों और जरूरी दस्तावेजों की उपलब्धता को लेकर भी सवाल पूछे गए। अदालत ने पुलिस से विस्तृत और रिकॉर्ड-आधारित जवाब देने को कहा।
29 सितंबर: पुलिस अधिकारियों और डॉक्टर की भूमिका की जांच के निर्देश
29 सितंबर को दिल्ली की अदालत ने मामले में एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि शव के निस्तारण और निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन में पुलिस अधिकारियों तथा गुरुग्राम सिविल अस्पताल के मेडिकल अधिकारी की भूमिका की जांच की जानी चाहिए।
रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 238 के तहत साक्ष्य गायब करने से संबंधित संभावित पहलू की जांच का निर्देश दिया। यह निर्देश अपने आप में किसी अधिकारी या डॉक्टर को दोषी ठहराने का फैसला नहीं है, बल्कि आरोपों और प्रक्रियागत चूकों की जांच कराने से संबंधित है।
अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में विसंगतियों पर स्पष्टीकरण के लिए संबंधित डॉक्टर को 15 अक्टूबर को पेश होने के लिए भी तलब किया। इस तरह मामला केवल हत्या के आरोपियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शव की पहचान और अंतिम संस्कार से जुड़ी पुलिस तथा मेडिकल प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आ गई।
30 सितंबर से 1 अक्टूबर: विभागीय कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा
30 सितंबर के आसपास गुरुग्राम पुलिस ने SHO और जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। आंतरिक रिपोर्टों में शव की पहचान, कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचना और रिकॉर्ड अपलोड करने से संबंधित प्रक्रियागत चूकें दर्ज की गईं।
1 अक्टूबर को गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर सिबाश कबिराज ने सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन हलफनामा दाखिल किया। इसमें स्वीकार किया गया कि अज्ञात शव की जानकारी CCTNS के निर्धारित IIF-10 फॉर्म में समय से दर्ज नहीं हुई, 24 घंटे के भीतर कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचना नहीं दी गई और कंट्रोल रूम से सूचना पड़ोसी राज्यों तक नहीं पहुंचाई गई।
पुलिस कमिश्नर ने प्रक्रियागत चूकों के लिए बिना शर्त माफी मांगी। साथ ही कहा कि स्थानीय पुलिस की ओर से कोई दुर्भावनापूर्ण मंशा नहीं थी।
दिल्ली पुलिस और गुरुग्राम पुलिस की ओर से दिए गए विवरणों में कुछ तारीखों और दस्तावेज सौंपे जाने के समय को लेकर अंतर भी रिपोर्ट किया गया। इस अंतर को स्पष्ट करना जांच और अदालत की आगे की कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
5 अक्टूबर: सुप्रीम कोर्ट ने जवाबदेही पर सवाल उठाए
मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान पुलिस की प्रक्रियागत चूकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर की गई कार्रवाई का मुद्दा उठा। अदालत ने दिल्ली और गुरुग्राम के पुलिस कमिश्नरों से व्यक्तिगत हलफनामे मांगे थे और यह स्पष्ट करने को कहा कि ऐसी चूक कैसे हुई तथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए।
Yuvraj की बहन ने अदालत में अज्ञात शवों और लापता व्यक्तियों की जानकारी साझा करने के लिए देशभर में एक समान मानक संचालन प्रक्रिया बनाने की मांग भी उठाई। इस मांग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी राज्य में शव मिलने पर उसकी जानकारी संबंधित पुलिस इकाइयों तक पहुंचे और गुमशुदगी की शिकायतों से समय पर मिलान हो सके।
7-8 अक्टूबर: बादशाहपुर SHO राजेश बागड़ी निलंबित
मामले में कार्रवाई आगे बढ़ने के बाद बादशाहपुर थाने के SHO राजेश बागड़ी को निलंबित कर दिया गया। इससे पहले जांच अधिकारी ASI साहून खान पर कार्रवाई हो चुकी थी।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, विभागीय जांच में यह देखा जा रहा है कि शव की पहचान के प्रयासों, घटनास्थल की निगरानी, वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना देने और निर्धारित कानूनी औपचारिकताओं में किस स्तर पर लापरवाही हुई।
प्रकाशित रिपोर्टों में पांच पुलिसकर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी भी दी गई है। कंट्रोल रूम और फॉरेंसिक टीम के कर्मियों की भूमिका की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है।
SHO का निलंबन विभागीय कार्रवाई है। इससे किसी अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी अपने आप अंतिम रूप से साबित नहीं होती; उसके लिए जांच और कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।
9 अक्टूबर: हरियाणा पुलिस ने जारी की नई SOP
Yuvraj मर्डर केस के बाद हरियाणा पुलिस ने अज्ञात शवों की बरामदगी और पहचान से जुड़ी प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए नई SOP जारी की है। इसका उद्देश्य ऐसी स्थिति में जानकारी साझा करने में देरी रोकना और जरूरी साक्ष्य सुरक्षित रखना है।
नई SOP के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- SHO की मौके पर मौजूदगी: अज्ञात शव मिलने पर संबंधित SHO को घटनास्थल पर पहुंचकर जांच की निगरानी करनी होगी।
- वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत सूचना: शव मिलने की जानकारी तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचानी होगी।
- तस्वीरें और डिजिटल रिकॉर्ड: शव की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेकर निर्धारित समयसीमा में CCTNS, ZIPNET और अन्य संबंधित डेटाबेस पर अपलोड करना होगा।
- सामान की सूची: शव के पास या घटनास्थल से मिले सामान का विवरण रिकॉर्ड में दर्ज और अपलोड करना होगा।
- मोबाइल फॉरेंसिक टीम: घटनास्थल पर मोबाइल फॉरेंसिक टीम को तुरंत पहुंचकर साक्ष्य जुटाने की व्यवस्था की गई है।
- DNA और अन्य जैविक नमूनों का संरक्षण: पहचान बाद में होने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए DNA नमूनों और अन्य जैविक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया है।
- अंतिम संस्कार के बाद भी साक्ष्य सुरक्षित: जिन अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार करना पड़े, उनसे जुड़े विसरा, सामान और अन्य जरूरी फॉरेंसिक सामग्री को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया तय की गई है।
- राज्यों के बीच सूचना साझा करना: कंट्रोल रूम के जरिए पड़ोसी जिलों और राज्यों तक शव की जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत की गई है। दिल्ली पुलिस के साथ तस्वीरें और विवरण तेजी से साझा करने के लिए भी एक संचार व्यवस्था विकसित की जा रही है।
नई SOP के तहत वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया गया है, ताकि किसी अज्ञात शव की पहचान के लिए जरूरी प्रक्रिया अधूरी न रहे।
