गुरुग्राम, वायरल सच (ब्यूरो) : पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने गुरुग्राम की एक स्थानीय अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें हरियाणा पुलिस के डीएसपी वीर सिंह के खिलाफ चालान दाखिल करने और दो महीने में कार्यवाही पूरी करने के निर्देश दिए गए थे। हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानून में कहीं वर्णित नहीं है, और यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है।
यह केस साल 2009 में दर्ज एक आपराधिक मामले से जुड़ा है, जिसमें गुरुग्राम के सिविल लाइंस थाने में IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के इरादे से जालसाजी) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
बाद में शिकायतकर्ता हंसराज राठी ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उन्हें झूठे केस में फंसाया और मारपीट की। इस आधार पर साल 2010 में एक और एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें कई पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया।
जांच के दौरान डीएसपी वीर सिंह को निर्दोष पाया गया, लेकिन फरवरी 2022 में गुरुग्राम की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने चार अन्य पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए डीएसपी वीर सिंह के खिलाफ भी चालान दाखिल करने और कार्यवाही पूरी करने का आदेश दे दिया।
हाई कोर्ट में क्या हुआ?
डीएसपी वीर सिंह ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने साफ कहा कि:
“ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानून के किसी भी प्रावधान में वर्णित नहीं है।”
हाई कोर्ट ने हाई कोर्ट नियमावली (अध्याय 1, भाग H, नियम 6) का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी या सरकारी कर्मचारी के आचरण पर कार्रवाई करनी हो, तो उसका स्पष्ट तरीका निर्धारित है:
- ट्रायल कोर्ट को अपना निर्णय जिला मजिस्ट्रेट को भेजना होता है,
- जिला मजिस्ट्रेट उसे गृह सचिव को भेजते हैं,
- और फिर गृह सचिव द्वारा यह निर्णय हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को अग्रसारित किया जाता है।
लेकिन इस मामले में इस पूरी प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधा चालान पेश करने का आदेश दे दिया गया, जो असंवैधानिक और अवैध है।
डीएसपी की दलील क्या थी?
डीएसपी वीर सिंह के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि:
- यदि ट्रायल कोर्ट को किसी अतिरिक्त आरोपी को शामिल करना होता, तो वह CrPC की धारा 193 या 319 के तहत प्रक्रिया अपना सकती थी।
- लेकिन ऐसा न करते हुए कोर्ट ने मुकदमे के अंत में चालान दाखिल करने का आदेश दिया, जो कानूनी रूप से अमान्य है।
- इससे याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा और करियर को गंभीर नुकसान पहुंच सकता था।
हाई कोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने 23 फरवरी 2022 के आदेश के पैरा 28 में दिए गए सभी निर्देशों और उससे जुड़ी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
हाई कोर्ट ने कहा:
“ऐसी कोई प्रक्रिया भारतीय कानून में नहीं है जो ट्रायल कोर्ट को इस तरह चालान दाखिल करने का अधिकार देती हो, खासकर तब जब आरोपी को पहले निर्दोष घोषित किया जा चुका हो।”
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