लंदन, वायरल सच (ब्यूरो) : रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने एक और नया मोड़ ले लिया है। ब्रिटेन ने रूस की प्रतिष्ठित सैन्य खुफिया एजेंसी जीआरयू (GRU) और उससे जुड़े 18 खुफिया एजेंटों पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह कार्रवाई रूस पर यूरोप में साइबर युद्ध, जानकारी की तोड़मरोड़, और अराजकता फैलाने के प्रयासों का हिस्सा मानते हुए की गई है।
क्या है जीआरयू (GRU)?
GRU यानी Main Directorate of the General Staff of the Armed Forces of the Russian Federation — रूस की विदेशी सैन्य खुफिया शाखा है। यह एजेंसी लंबे समय से पश्चिमी देशों में जासूसी, साइबर अटैक और सैन्य अभियानों में संलिप्त मानी जाती रही है। ब्रिटेन के अधिकारियों के अनुसार, जीआरयू के ये एजेंट पिछले कई वर्षों से ब्रिटिश संस्थानों और रणनीतिक क्षेत्रों को निशाना बना रहे थे।
किस आधार पर लगे हैं प्रतिबंध?
ब्रिटेन के विदेश सचिव डेविड लैमी (David Lammy) ने अपने बयान में कहा:
“GRU के जासूस यूरोप में अस्थिरता फैलाने, यूक्रेन की संप्रभुता को कमजोर करने और ब्रिटिश नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।”
ब्रिटेन के विदेश कार्यालय (Foreign Office) की ओर से बताया गया कि ये प्रतिबंध मुख्यतः तीन प्रमुख सैन्य खुफिया इकाइयों और 18 एजेंटों पर केंद्रित हैं, जो साइबर हमलों, डाटा चोरी, और फेक न्यूज़ फैलाने में लिप्त पाए गए।
साइबर हमलों का लंबा रिकॉर्ड
इन खुफिया एजेंटों पर आरोप है कि इन्होंने पिछले वर्षों में ब्रिटिश मीडिया हाउस, टेलीकॉम कंपनियों और ऊर्जा सेक्टर को निशाना बनाकर साइबर हमले, मैलवेयर इनफेक्शन, और डाटा लीक की घटनाएं अंजाम दीं।
ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार, GRU द्वारा संचालित इकाइयों ने कई बार युक्रेन के शहर मारियुपोल जैसे क्षेत्रों पर मिसाइल हमलों और डिजिटल हस्तक्षेप में भी भूमिका निभाई है।
2018 की सैलिसबरी घटना फिर चर्चा में
इस प्रतिबंध में सर्गेई स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया स्क्रिपल के खिलाफ कथित मैलवेयर हमले से जुड़े एजेंट भी शामिल हैं।
याद दिला दें, 2018 में सैलिसबरी (Salisbury) में हुए नर्व एजेंट अटैक ने दुनियाभर का ध्यान खींचा था। ब्रिटेन ने इस हमले के पीछे भी GRU का हाथ बताया था, जिसमें रूस की कड़ी आलोचना हुई थी।
भविष्य में क्या असर पड़ेगा?
इन प्रतिबंधों से रूस और ब्रिटेन के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्ते और खराब होने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, GRU एजेंटों की पहचान सार्वजनिक कर देना रूस के खुफिया अभियानों पर सीधा प्रहार है।
ब्रिटेन का यह कदम यूरोपीय यूनियन और NATO देशों के लिए भी एक सख्त संदेश माना जा रहा है कि रूस की “हाइब्रिड वॉरफेयर” को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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