जम्मू-कश्मीर, वायरल सच (ब्यूरो) : यह कहानी है 1999 के कारगिल युद्ध की उस ऐतिहासिक लड़ाई की, जिसने भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान को अमर कर दिया। समुद्र तल से 15,990 फीट की ऊंचाई पर स्थित प्वाइंट 4875, जिसे ‘पिंपल टू’ के नाम से जाना जाता था, सामरिक दृष्टि से बेहद अहम था। पाकिस्तानी सैनिकों ने आतंकियों के भेष में इस चोटी पर कब्जा जमा लिया था, जिसे खाली कराना भारतीय सेना के लिए चुनौती से कम नहीं था। इस असंभव से लगने वाले मिशन की जिम्मेदारी 17 जाट रेजीमेंट को सौंपी गई थी।
6 जुलाई 1999 को, 17 जाट रेजीमेंट की ‘चार्ली कंपनी’ ने इस मिशन को अंजाम तक पहुंचाने की शुरुआत की। इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे मेजर ऋतेश शर्मा। बर्फीले तूफानों, दुर्गम चढ़ाई और दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच भारतीय सैनिकों ने चोटी की ओर बढ़ना शुरू किया।
7 जुलाई को जंग अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई, जब भारतीय सैनिकों और पाकिस्तानी घुसपैठियों के बीच आमने-सामने की टक्कर शुरू हो गई। इस संघर्ष में मेजर ऋतेश शर्मा गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें वापस बेस भेजना पड़ा। अब जिम्मेदारी थी युवा और जांबाज अफसर कैप्टन अनुज नय्यर की, जिन्हें चार्ली कंपनी की कमान सौंपी गई।
कैप्टन अनुज नय्यर ने स्थिति को समझते हुए नई रणनीति तैयार की। उन्होंने असॉल्ट टीम को दो हिस्सों में बांटा — एक टीम का नेतृत्व कर रहे थे कैप्टन विक्रम बत्रा और दूसरी की कमान उन्होंने स्वयं संभाली। दुश्मन की पोजिशन का अंदाजा लगाने के लिए एक टोही दल भेजा गया, जिसने चार मजबूत बंकरों की मौजूदगी की पुष्टि की।
कैप्टन अनुज ने बिना देरी किए अपनी टीम के साथ बंकरों पर हमला बोल दिया। घने अंधेरे, भीषण ठंड और जानलेवा गोलियों के बीच भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस दिखाया। एक-एक कर दुश्मन के बंकर तबाह होते गए। इस हमले में कैप्टन अनुज ने दुश्मन के दो बंकरों को नष्ट कर दिया, लेकिन इसी दौरान वे शहीद हो गए।
कैप्टन अनुज नय्यर की शहादत ने युद्ध की दिशा बदल दी। उनकी वीरता ने चार्ली कंपनी के हर जवान को प्रेरित किया और प्वाइंट 4875 को दुश्मन के कब्जे से मुक्त करा लिया गया। इस जीत ने न सिर्फ एक रणनीतिक चोटी को भारत की झोली में डाला, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि भारतीय सैनिक किसी भी कठिनाई के आगे नहीं झुकते। उनकी वीरता को सम्मानित करते हुए कैप्टन अनुज नय्यर को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
कारगिल की जंग सिर्फ एक सैन्य संघर्ष नहीं थी, बल्कि यह भारतीय सेना की दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और सर्वोच्च बलिदान की प्रतीक थी। प्वाइंट 4875 की यह कहानी हर भारतीय को यह याद दिलाती है कि हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं क्योंकि वहाँ कैप्टन अनुज नय्यर जैसे वीर खड़े हैं — जो देश की खातिर अपने प्राण तक न्योछावर करने से पीछे नहीं हटते।
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