नई दिल्ली, वायरल सच (ब्यूरो): क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल ने कैंसर मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं के अवैध कारोबार से जुड़े एक बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा किया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि गिरोह नकली दवाओं के अलावा अस्पतालों से कथित तौर पर हेराफेरी कर निकाली गई एंटी-कैंसर दवाओं को विभिन्न राज्यों में सप्लाई करता था।
पुलिस के मुताबिक, आरोपियों के कब्जे और उनसे जुड़े ठिकानों से करीब 9 करोड़ रुपये मूल्य की 588 भरी हुई एंटी-कैंसर दवा की शीशियां बरामद हुई हैं। इसके साथ ही 6 खाली शीशियां, 7 खाली दवा के डिब्बे और अन्य दवाओं की 3021 यूनिट भी मिली हैं। तलाशी के दौरान करीब 50 लाख रुपये नकद, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रजिस्टर, डायरियां और पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी जब्त की गई।
क्राइम ब्रांच के अनुसार गिरोह का नेटवर्क दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, हैदराबाद, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था। जांच में सामने आया कि नेटवर्क से जुड़े लोग दवाओं को अलग-अलग स्रोतों से जुटाकर कई स्तरों पर मौजूद बिचौलियों के जरिए आगे सप्लाई करते थे।
तीन तरीकों से जुटाई जाती थीं दवाएं
पुलिस की जांच के अनुसार आरोपी मुख्य रूप से तीन तरीकों से दवाओं की व्यवस्था करते थे। इनमें अधिकृत सप्लाई चैनल से बाहर नकली दवाओं की खरीद, अस्पतालों में मरीजों के लिए रखी दवाओं की कथित चोरी या हेराफेरी, तथा सरकारी संस्थानों और गोदामों से मरीजों के लिए भेजी गई दवाओं को अवैध रूप से बाजार तक पहुंचाना शामिल था।
जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में दवाओं की खरीद-बिक्री से जुड़े वैध बिल, खरीद रिकॉर्ड और जरूरी लाइसेंस मौजूद नहीं थे। दवाओं को पहले घरों अथवा अन्य सुरक्षित ठिकानों पर रखा जाता और बाद में अलग-अलग बिचौलियों के माध्यम से बाजार में भेजा जाता था।
पुराने कार्टन और डिब्बों से होती थी री-पैकिंग
पुलिस के मुताबिक, नेटवर्क के सदस्य दवाओं की पहचान छिपाने के लिए पुराने कार्टन और खाली डिब्बों को संभालकर रखते थे। इनका इस्तेमाल नई खेप तैयार करने में किया जाता था। आरोप है कि बैच नंबर, एमआरपी और अन्य पहचान चिह्नों को रासायनिक पदार्थ से मिटाने के बाद दवाओं को दोबारा पैक किया जाता था।
इसके लिए थर्माकोल बॉक्स, बबल रोल, पॉलीथिन और चिपकने वाली टेप जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता था। कारोबार का हिसाब रखने के लिए रजिस्टर और डायरियां भी रखी जाती थीं, जिन्हें पुलिस ने जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया है।
जून में मिली थी नेटवर्क की सूचना
क्राइम ब्रांच के अनुसार, 22 जून को इंस्पेक्टर कमल कुमार की टीम को इस संगठित नेटवर्क के संबंध में महत्वपूर्ण सूचना मिली थी। इसके बाद पूर्वी दिल्ली, रोहिणी और मुंबई सहित कई स्थानों पर संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाई गई और उनका सत्यापन कराया गया।
इसके बाद 11 जुलाई को एसीपी रमेश लांबा की निगरानी में सात टीमें गठित कर दिल्ली और नवी मुंबई में एक साथ कार्रवाई की गई। तलाशी अभियान में ड्रग्स विभाग और स्थानीय पुलिस की सहायता भी ली गई।
छापेमारी के दौरान डार्जालेक्स, इमफिंजी, एर्बिटक्स, ओपडायटा, गैजिवा, बावेंसियो, एडसेट्रिस और कीट्रूडा जैसी महंगी एंटी-कैंसर दवाएं बरामद होने की बात सामने आई। इसके बाद 12 जुलाई को एफआईआर दर्ज कर मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई।
कई राज्यों में फैली थी सप्लाई चेन
जांच में गिरफ्तार आरोपियों की अलग-अलग भूमिकाएं सामने आई हैं। पुलिस के अनुसार कुछ आरोपी दवाओं की खरीद और सप्लाई, कुछ बिचौलियों की भूमिका, जबकि कुछ पर अस्पतालों से दवाएं बाहर निकालकर नेटवर्क तक पहुंचाने का आरोप है।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि बरामद दवाओं का मूल स्रोत क्या था, इन्हें किन-किन लोगों और संस्थानों तक पहुंचाया गया तथा इस नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।
बाकी नेटवर्क की तलाश जारी
पुलिस के मुताबिक मामले की जांच अभी जारी है। जांच का फोकस दवाओं की पूरी सप्लाई चेन, पैसों के लेन-देन, अंतिम खरीदारों और नेटवर्क से जुड़े अन्य कारोबारियों पर है। पुलिस को आशंका है कि गिरोह से जुड़े अन्य लोगों और कारोबारी संस्थाओं की भूमिका भी सामने आ सकती है।
अब तक की कार्रवाई में 17 गिरफ्तारियां और करीब 9 करोड़ रुपये की दवाओं की बरामदगी इस मामले में सामने आई है। पुलिस के अनुसार जांच आगे बढ़ने पर और गिरफ्तारियां एवं बरामदगी होने की संभावना है।

