साहित्य सभा में चीरहरण: हिंदी साहित्य की सच्चाई पर सवाल

वायरल सच (ब्यूरो) : पिछले सप्ताह पटना में साहित्य सभा में चीरहरण की जो घटना हुई, उसने फिर से स्पष्ट कर दिया है कि स्त्री हर जगह सुरक्षित नहीं है—चाहे वह कितनी भी शिक्षित, कितनी भी आत्मनिर्भर क्यों न हो। यह देखकर आश्चर्य होता है कि वही साहित्यिक और अकादमिक समुदाय, जो लेखन में स्त्री सशक्तिकरण, गरिमा और अस्मिता की लंबी-लंबी वाद-विवेचनियों में डूबता है, जब खुद उस मैदान में आता है, तो वहां की वास्तविकता उसे खामोशी के अंधियारे में धकेल देती है।

साहित्य सभा में चीरहरण: पटना घटना की जाहिर पीड़ा

पटना स्थित कवयित्री ने जब उस युवा लेखिका ने एक प्रतिष्ठित साहित्य सभा में अपने रचनात्मक कार्य प्रस्तुत किया, तब वहीं एक वरिष्ठ कवि द्वारा उसके चीरहरण की घटना हुई। यह न केवल साहित्यिक पटल का अपमान था बल्कि उसके आत्मसम्मान पर हमला भी था। उक्त घटना में वरिष्ठ कवि द्वारा अभद्र, अश्लील और पत्नी-दोषपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया गया। इस पूरे विवाद ने हिंदी साहित्य के उस आदर्शवाद की चिथड़ी निकाल दी, जिसका दम कभी बड़े-बड़े मंचों पर ब्लॉग, सेमिनार और शैक्षणिक चर्चाओं के दौरान कराया जाता था।

पितृसत्तात्मक बुनावट और अधिकार का गहरा घाव

“साहित्य सभा में चीरहरण” जैसे शब्द हमें यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि भाषा-भाष्य कितनी बड़ी फंदेबाज़ी है। वे लेखन के आदर्शों और व्यवहार की वास्तविकता के बीच की खाई पर सवाल खड़े करते हैं। उच्च शिक्षित लोग भी जब इस तरह की शर्मनाक हरकतों को सामान्य व्यवहार बना लेते हैं, तो इसका तात्पर्य केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर विमर्श की कमी को दर्शाता है।

उत्तरदायित्वहीन साहित्यिक संस्थाएं

जिन संस्थाओं ने इस घटना को प्रोत्साहित किया या दीक्षा दी, वे स्वयं आत्मपरीक्षा की राह पर कतई आगे नहीं बढ़ीं। ‘नई धारा’ संस्था ने तत्काल जबकि विवाद अचानक बढ़ा तो बयान जारी किया, लेकिन इसके साथ कानूनी कार्रवाई या लिखित माफी के अलावा कुछ ठोस कदम नहीं उठाए। सोशल मीडिया पर हस्तियों ने टिप्पणियाँ कीं, लेकिन उसी रात सफेदपोश बहसों से आगे कविता-संगोष्ठी प्रकाशित हो गईं।

जनवादी लेखक संघ, संस्कृति मंच और राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ जैसी संस्थाओं ने निंदा जरूर की, लेकिन उन्होंने कभी पुलिस में FIR दर्ज करवाने की मांग नहीं की। “साहित्य सभा में चीरहरण” जैसे कृत्यों के लिए कानूनी कार्रवाई करने का साहस इन बौद्धिक जगहों को देना चाहिए था, लेकिन वे गुमनाम चुप्पी झेल गए। इस चुप्पी ने स्कूल-अखाड़े की तरह पुरुषवादी व्यवस्था को बल दिया, जिसने अपनी असली शक्ल नहीं खोई।

साहित्य की परिकल्पना कब वास्तविक बन पाएगी?

हिंदी साहित्य में जाति-धर्म के खिलाफ आवाज़ तेज होती है, लेकिन यौन हिंसा जैसी विषयों पर ये संगठन या मंच चुप्पी साध लेते हैं। साहित्य में यह भेद कभी जाहिर नहीं होता, लेकिन जब व्यक्तिगत स्तर पर साहित्यकारों की पोल खुलती है, तो ‘क्रान्ति का डंडा’ अचानक खामोश हो जाता है।

आज़ादी का अगला कदम: न्याय की गुहार तक जाना

सच्ची उन्नति तब होगी जब कवयित्री खुद पुलिस थाने पहुँचेगी और FIR दर्ज करवाएगी। फिर चाहे किसी भी मंच, नागरीय प्रतिष्ठा या साहित्यिक सम्मान में कमी क्यों न लगे—लेकिन “साहित्य सभा में चीरहरण” जैसी घटनाओं पर समाज और संस्थाएं चुप नहीं रह सकतीं।

यह वक्त किसी को ‘साफ माफ़ी-पत्र’ या ‘एच में लिखा बयान’ भेजने का नहीं है— बल्कि यह वक्त है आंचल को परचम बनाकर उठाने का। जब न्याय की गरज आएगी, तब ही यह दर्शाएगा कि हिंदी साहित्य में बौद्धिक विमर्श केवल शब्दों तक सीमित नहीं बल्कि व्यवहार की जिम्मेदारी भी निभाता है।

हमें फ़ॉलो करें

फेसबुक – https://www.facebook.com/viralsachnewz
यूट्यूब – https://www.youtube.com/@viralsachnewz
इंस्टाग्राम – https://www.instagram.com/viralsachnewz/
ट्विटर – https://x.com/viralsachnewz

अधिक जानकारी के लिए फ़ॉलो करें

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles