ईरान, वायरल सच (ब्यूरो) : रूस, चीन और ईरान के बीच जटिल रिश्ते और बढ़ते तनाव के बीच, ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों ने इस क्षेत्र को एक नए संकट में डाल दिया है। इस परिस्थिति में रूस और चीन का ईरान पर अपना समर्थन कैसे व्यक्त करेंगे, यह वैश्विक राजनीति के लिए महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
इस उथल-पुथल में सबसे अहम सवाल यह उठता है: क्या रूस और चीन, जो अब तक शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर रहे हैं, ईरान का खुला समर्थन करेंगे? और यदि हाँ, तो किस रूप में?
रूस चीन ईरान हमला: रूस का कूटनीतिक रुख
रूस की प्रतिक्रिया परंपरागत कूटनीतिक भाषा में लिपटी हुई थी। मास्को ने अमेरिका द्वारा “ईरान के इस्लामी गणराज्य के कई परमाणु केंद्रों” पर किए गए हमलों की निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया। साथ ही उसने शांति बहाली और कूटनीतिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।
हालांकि यह बयान तीखा लग सकता है, लेकिन उसकी सीमाएं स्पष्ट हैं। रूस ने न तो किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई का वादा किया और न ही खुलकर कोई प्रतिबद्धता जताई। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि रूस स्वयं यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है और पश्चिम के साथ उसके रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण हैं।
फिर भी, रूस का ईरान से रिश्ता महज औपचारिक नहीं है। वह लंबे समय से ईरान को रक्षा तकनीक, असैनिक परमाणु सहयोग और कूटनीतिक संरक्षण प्रदान करता रहा है। यदि ईरान को अमेरिका और उसके सहयोगियों से रणनीतिक संतुलन की आवश्यकता है, तो रूस ही वह शक्ति है जो उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैधता और संरक्षण दिला सकती है।
संभावित रूसी सहायता:
ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को उन्नत बनाना
- सैन्य सैटेलाइट डेटा की साझेदारी
- परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत सीमित रखने के लिए दबाव
- संयुक्त राष्ट्र में कूटनीतिक पैरोकारी
रूस यह भी चाहेगा कि ईरान छद्म युद्ध की रणनीति (proxy warfare) से परहेज़ करे ताकि पश्चिम के साथ और तनाव न बढ़े।
चीन की रणनीति और ईरान के लिए चीन का समर्थन
चीन ने भी अमेरिका और इज़रायल की कार्रवाइयों की आलोचना की है, लेकिन उसका रुख ज्यादा सतर्क और संतुलित है। बीजिंग की पहली प्राथमिकता है — क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा। चीन खाड़ी से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है और इस युद्ध के फैलाव से उसकी ऊर्जा नीति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
चीन अपने वैश्विक प्रभाव को सैन्य के बजाय आर्थिक और तकनीकी ताकत से विस्तार देने का पक्षधर है। इसलिए वह इस संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदारी से बचना चाहेगा। फिर भी, यह चीन की शैली है कि वह परोक्ष तरीकों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
संभावित चीनी सहयोग:
- मिसाइल गाइडेंस, ड्रोन, और साइबर सुरक्षा जैसी तकनीकों का ट्रांसफर
- अंतरिक्ष निगरानी तकनीक की सीमित साझेदारी
- ईरान को गुप्त सैन्य-तकनीकी सहायता
- संयुक्त राष्ट्र में रूस के साथ मिलकर ईरान की पैरोकारी
चीन इस संघर्ष का उपयोग अमेरिका को घेरने और वैश्विक बहुध्रुवीयता (multipolarity) को मजबूत करने के अवसर के रूप में देख सकता है, लेकिन वह यह सब पर्दे के पीछे से करेगा।
अमेरिकी हमले के बाद रूस चीन ईरान संबंधों का भविष्य
रूस और चीन, दोनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। वे अमेरिका के खिलाफ संयुक्त रूप से एक कूटनीतिक मोर्चा बना सकते हैं। वे:
- हमलों को “अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए खतरा” बताकर आपात सत्र बुला सकते हैं
- अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) से नए निरीक्षण और रिपोर्ट की मांग कर सकते हैं
- रेडियोधर्मी प्रदूषण और मानवीय संकट को वैश्विक चिंता बनाकर अमेरिका पर दबाव बना सकते हैं
हालांकि यह स्पष्ट है कि अमेरिका और उसके सहयोगी अपनी कार्रवाई को “निवारक रक्षा” (preemptive defense) के रूप में प्रस्तुत करेंगे, लेकिन रूस और चीन इसे “आक्रामक शक्ति प्रयोग” की संज्ञा देकर अंतरराष्ट्रीय जनमत को प्रभावित कर सकते हैं।
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